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फ्रांस से नाराज होकर सड़कों पर उतरने वाले इस्लामी राष्ट्र चीन में उइगर मुसलमानों के दमन पर मौन क्यों?

पेरिस-नीस की आतंकी घटनाओं पर फ्रांस की प्रतिक्रिया के खिलाफ कई इस्लामी राष्ट्र और भारतीय उपमहाद्वीप के तमाम मुसलमान गोलबंद हैं। जहां कराची में फ्रांस विरोधी प्रदर्शन में हिंदू मंदिर तोड़कर उसमें रखी मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया, वहीं उन्मादी भीड़ ने ढाका स्थित कोमिला में दर्जनों अल्पसंख्यक हिंदुओं के घरों को आग लगा दी। घटना हुई फ्रांस में, किंतु गुस्सा दूसरों पर फूट रहा। भारत में भी भोपाल, मुंबई, हैदराबाद आदि नगरों में सैकड़ों मुसलमानों ने उत्तेजित नारों के साथ प्रदर्शन किया। इसके साथ मुनव्वर राणा सहित कई मुस्लिम फ्रांस की आतंकी घटनाओं को उचित ठहराते दिखे। ऐसे लोग यह समझने को तैयार नहीं कि दरअसल फ्रांसीसी संस्कृति में सभी नागरिकों को, चाहे वह किसी भी समुदाय का हो, उसे किसी भी विषय, व्यक्ति, मान्यता और परंपरा पर अपनी बात रखने की स्वतंत्रता है। यह फ्रांस की उदार जीवनशैली का प्रतीक भी है।

फ्रांसीसी मुस्लिम इस्लाम के लिए विशेषाधिकार चाहते हैं

फ्रांस की कुल 6.5 करोड़ की आबादी में मुस्लिम 55-60 लाख हैं। इनमें से अधिकांश प्रवासी हैं और अधिकतर शरणार्थी बनकर फ्रांस आए हैं। फ्रांसीसी मुस्लिम नागरिकों को वही समान अधिकार प्राप्त हैं, जो वहां के बहुसंख्यक ईसाइयों, अन्य अल्पसंख्यकों और नास्तिक नागरिकों को मिले हुए हैं। ये कल तक के शरणार्थी और आज नागरिक बने लोग अपने और इस्लाम के लिए विशेषाधिकार चाहते हैं। फ्रांस सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में इस्लाम और उसके प्रतीकों को उसी कसौटी पर कसा जाएगा, जैसे दशकों से ईसाई, हिंदू, यहूदी आदि कसे जा रहे हैं।

इगर मुसलमानों की मजहबी पहचान नष्ट कर रहा चीन के खिलाफ मुस्लिम चुप हैं

सवाल है कि फ्रांस के खिलाफ सड़कों पर उतरे मुस्लिम इतने आक्रोशित क्यों हैं? क्या यह पैगंबर साहब के अपमान से जुड़ा है या फिर कोई और कारण है? क्योंकि यदि बात पैगंबर साहब के अपमान की होती तो चीन के खिलाफ इस क्षेत्र के मुसलमान कहीं अधिक आंदोलित होते। चीन योजनाबद्ध ढंग से न केवल 1.2 करोड़ उइगर मुसलमानों का उत्पीड़न, बल्कि उनकी मजहबी पहचान भी नष्ट कर रहा है। चीन में उनका सांस्कृतिक नरसंहार हो रहा है, लेकिन उसके खिलाफ इस क्षेत्र में किसी प्रकार का आंदोलन तो दूर रहा, फ्रांस से नाराज होकर सड़कों पर उतरने वाले मुसलमान इसका संज्ञान तक नहीं ले रहे हैं।

मुस्लिम राष्ट्र चीन के एक टीवी शो में मुहम्मद साहब का चित्र दिखाने पर भी मौन हैं

वे चीन के एक टीवी शो में मुहम्मद साहब का चित्र दिखाने पर भी मौन हैं। आखिर क्यों? पाकिस्तान एक घोषित इस्लामी देश है और स्वयं को विश्व में इस्लामी संस्कृति का नेता मानता है। हैरानी की बात यह है कि वह भी चीन के इस्लाम विरोधी अभियान पर न केवल चुप है, अपितु चीन का दुमछल्ला भी बना हुआ है। वैसे पाकिस्तान की चीन से गहरी मित्रता का शायद एक कारण यह भी है कि उसका वैचारिक अधिष्ठान, जो ‘काफिर’ भारत को हजारों घाव देकर मौत के घाट उतारने का प्रपंच दशकों से रच रहा है, उसमें चीन उसका सहयोगी बन सकता है। बांग्लादेश भी चीन का रणनीतिक साझेदार है।

फ्रांस के घटनाक्रम में विचित्र प्रतिक्रिया

फ्रांस के घटनाक्रम में एक और विचित्र प्रतिक्रिया 130 भारतीय ‘बुद्धिजीवियों’ ने भी दी है। अपने संयुक्त बयान में उन्होंने फ्रांस में हुए जिहादी हमलों और उन मुस्लिम बुद्धिजीवियों के वक्तव्यों की निंदा की है, जो फ्रांस के आतंकी हमलों को उपयुक्त बता रहे थे। क्या इनकी प्रतिक्रिया में दोहरे मापदंड की दुर्गंध नहीं आ रही? देखा जाए तो यह स्वयंभू सेक्युलरवादी-उदारवादी-प्रगतिशील कुनबा यदा-कदा देश में हुए आतंकी हमले या मजहबी हिंसा की नपे-तुले शब्दों में निंदा करता है, किंतु जब किसी आतंकी-जिहादी पर संकट आता है, तब यही लोग उनका कवच बन जाते हैं। 1993 के मुंबई आतंकी हमले में दोषी याकूब मेमन की फांसी रुकवाने के लिए मध्यरात्रि सर्वोच्च न्यायालय पहुंचना और 2001 में संसद हमले के दोषी अफजल गुरु सहित कश्मीर में आतंकियों-अलगाववादियों से सहानुभूति रखना इसका प्रमाण है।

फ्रांस में जिहादी आतंक के शिकार लोगों पर उमड़ी संवेदनाएं, लेकिन कमलेश तिवारी पर लोग चुप रहे

फ्रांस में जिहादी आतंक का शिकार हुए लोगों के लिए तो इनकी संवेदनाएं उमड़ गईं, किंतु कमलेश तिवारी की दुर्भाग्यपूर्ण नियति पर ये लोग चुप रहे। गत वर्ष दो जिहादियों ने कमलेश की 15 बार चाकू घोंपकर और गोली मारकर हत्या इसलिए कर दी थी, क्योंकि उसने पैगंबर साहब का अपमान किया था। क्या ऐसा ही ‘अपराध’ उस फ्रांसीसी शिक्षक ने भी नहीं किया था, जिसकी जिहादी द्वारा निर्मम हत्या होने पर इन ‘बुद्धिजीवियों’ की आत्मा भीतर तक हिल गई है? क्या इस विरोधाभास का कारण पीड़ित की आस्था है?

130 ‘बुद्धिजीवियों’ का फ्रांस के संदर्भ में जिहादी हिंसा का विरोध केवल खानापूर्ति

फ्रांस में इस्लाम के नाम पर मौत के घाट उतारे गए चारों लोग ईसाई थे, जिसमें तीन की हत्या चर्च के भीतर हुई थी, जबकि कमलेश हिंदू थे। सच तो यह है कि देश के स्वघोषित बुद्धिजीवियों में से अधिकांश का प्रत्यक्ष-परोक्ष संबंध पश्चिमी देशों से संचालित एनजीओ से है, जो किसी न किसी रूप में यूरोपीय-अमेरिकी चर्च द्वारा वित्तपोषित हैं। ऐसे में 130 ‘बुद्धिजीवियों’ का फ्रांस के संदर्भ में जिहादी हिंसा का विरोध केवल खानापूर्ति और पश्चिमी देशोें के अपने आकाओं को संतुष्ट करने का कुप्रयास है। यदि यह वर्ग वाकई जिहादी हिंसा के खिलाफ होता, तो वह उन पांच लाख कश्मीरी पंडितों के लिए भी अपनी आवाज बुलंद करता, जो 30 वर्ष पहले जिहादी दंश के कारण पलायन के लिए विवश हो गए थे और अब तक अपनी मातृभूमि पर नहीं लौट पाए हैं। जब 1985-86 में शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को कट्टरपंथियों के दबाव में आकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने संसद में पलट दिया था, तब ऐसे ही कथित बुद्धिजीवियों ने उसके विरोध में एक बार भी मुंह नहीं खोला था।

फ्रांस का साथ देने वाला भारतीय वर्ग खंडित भारत को कई टुकड़ों में देखना चाहता है

सच तो यह है कि हालिया फ्रांसीसी घटनाक्रम का विरोध करने वाला भारतीय वर्ग और फ्रांस का साथ देने वाला 130 लोगों का समूह उसी चिंतन का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसने 1947 में इस्लाम के नाम पर भारत के रक्तरंजित विभाजन की लकीर खींची थी और अब भी खंडित भारत को कई टुकड़ों में देखना चाहता है। इस वर्ष नागरिकता संशोधन अधिनियम का हिंसक विरोध इसका प्रमाण है।

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