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बिहार में राजग की विपरीत हालात में बेहतर जीत का श्रेय करिश्माई नेता पीएम मोदी और नीतीश को जाता है

राजनीति के मोर्चे पर तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद राजग बिहार में अपनी सरकार बचाने में सफल रहा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लगातार चौथी बार चुनाव जीतने का रिकॉर्ड कायम कर लिया। कुछ ही नेताओं ने यह करिश्मा किया है। राजग की सफलता में सबसे बड़ा कारण यह रहा कि बिहार के लोगों ने नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की मंशा और सेवा पर अधिक भरोसा किया। कोविड महामारी और र्आिथक मंदी की पृष्ठभूमि में हुए इस चुनाव में यदि भीतरी असहयोग के तत्व सक्रिय नहीं होते तो राजग को और बड़ी सफलता मिलती। यह कहना एक हद तक सही है कि घर को आग लग गई, घर के चिराग से। यहां आशय सिर्फ चिराग पासवान से ही नहीं है। कुछ अन्य ‘मोमबत्तियों’ ने भी राजग को जहां-तहां झुलसाया

प्रधानमंत्री मोदी की नीतीश के पक्ष में भावनात्मक अपील ने बड़ी भूमिका निभाई

राजग के कुछ परंपरागत मतदाताओं ने भी इस बार उसका साथ नहीं दिया। इसके बावजूद यदि सफलता मिली तो उसका कारण यह रहा कि अति पिछड़ों और महिलाओं के साथ जदयू को भाजपा का भरपूर सहारा मिला। हालांकि सवर्णों के बीच के कुछ परंपरागत राजग समर्थकों ने अघोषित कारणों से नीतीश कुमार को सबक सिखाने का प्रयास किया, किंतु प्रधानमंत्री की नीतीश के पक्ष में भावनात्मक अपील ने बड़ी भूमिका निभाई। नीतीश कुमार के अहंकारी होने का खूब प्रचार हुआ, पर चुनाव नतीजे ने बताया कि वह तो आम लोगों के सेवक की भूमिका निभाते रहे। यह सच है कि कुछ सार्वजनिक कामों को करने में नीतीश सरकार विफल रही। सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार और अपराध के मामलों में लोग बेहतरी की जो उम्मीद कर रहे थे, वह नहीं हुआ, फिर भी अधिकांश लोगों ने मुख्यमंत्री की मंशा पर शक नहीं किया और विकल्प को अधिक खराब माना।

राजनीतिक विरोधियों के पास नीतीश के खिलाफ कहने को कुछ नहीं था

दो मामलों में राजनीतिक विरोधियों के पास भी नीतीश के खिलाफ कहने को कुछ नहीं था। एक तो उन पर आर्थिक गड़बड़ियों का कोई आरोप नहीं है। दूसरी बात यह कि नीतीश ने कभी अपने रिश्तेदार या वंशज को राजनीति में आगे नहीं किया। इस बुराई से भरे पड़े बिहार में नीतीश को इसका भी लाभ मिला। तमाम लोगों को यह भी लगा कि कमियां दूर करने और बेहतर काम करने की उम्मीद वे राजग सरकार से ही कर सकते हैं, राजद से नहीं।

राजद को तेजस्वी यादव के रूप में एक योग्य नेतृत्व मिल गया 

राजद को अभी यह साबित करना बाकी है कि वह भी लोगों की उम्मीदों पर खरा उतर सकता है। अतीत का खराब रिकॉर्ड अब भी उसका पीछा कर रहा है। हालांकि तेजस्वी यादव ने खुद को पहले से बेहतर साबित करने की कोशिश जरूर की। राजद को एक योग्य नेतृत्व मिल गया है। चुनाव प्रचार के दौरान राजद ने अपने पोस्टरों से लालू-राबड़ी की तस्वीरें हटा दी थीं। चुनाव के ठीक पहले तेजस्वी ने अपनी पार्टी और सरकार की पिछली गलतियों के लिए माफी भी मांगी थी। राजद ने नतीजों के बाद अनुचित नारेबाजी, हर्ष फायरिंग, प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अशिष्ट व्यवहार आदि नहीं करने का सख्त निर्देश देकर भी धारणा बदलने की कोशिश की। ऐसा शायद इसलिए भी किया गया, क्योंकि हाल में सोशल मीडिया पर राजद समर्थकों ने अशिष्टता की सारी हदें पार कर दी थीं।

बिहार के लोगों को अब भी जंगलराज याद है

चुनाव नतीजे बताते हैं कि बिहार के अधिकतर लोगों को अब भी 1990-2005 का जंगलराज याद है। फिर भी यह मानना पड़ेगा कि तेजस्वी उम्मीद से बेहतर नेता के रूप में उभरे। उन्होंने आम तौर पर जिम्मेदारी से बातें कीं। यदि राजद के उद्दंड कार्यकर्ताओं को नियंत्रित करने का उनका प्रयास जारी रहा तो राजद एक जिम्मेदार दल के रूप में उभर सकता है, किंतु आश्वासन देने में तेजस्वी एक जिम्मेदार नेता का सुबूत नहीं दे सके। 10 लाख सरकारी नौकरियां देने का निर्णय पहली ही कैबिनेट बैठक में कर देने के उनके वादे का कोई खास असर नहीं पड़ा। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि कुछ भी असर नहीं पड़ा। यदि राजद मुस्लिम-यादव वोट बैंक के बाहर से भी कुछ मत प्राप्त कर सका तो उसका एक कारण नौकरियों का वादा भी था। पिछले साल राजद ने संसद में सवर्ण आरक्षण का विरोध कर दिया था। नतीजतन लोकसभा चुनाव में उसके दो ऐसे सवर्ण उम्मीदवार हार गए, जिनकी जीत की उम्मीद थी। उस विरोध का असर एक हद तक इस विधानसभा चुनाव पर भी पड़ा।

राजग को लोजपा से हुए नुकसान की भरपाई ओवैसी की पार्टी ने की

असद्दुदीन ओवैसी के दल ने परोक्ष रूप से राजग को मदद पहुंचाई। लोजपा के राजग से अलग होने का जो नुकसान हुआ, उसकी क्षतिपूर्ति एक हद तक परोक्ष रूप से ओवैसी ने कर दी। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी के दलों से उम्मीद से कम मदद मिली। ठीक उसी तरह, जिस तरह कांग्रेस से राजद को कम ही मदद मिली। राजद ने कांग्रेस को 70 सीटें देकर दूरदर्शिता का परिचय नहीं दिया। यह आने वाले दिनों में पता चलेगा कि बिहार राजग का चिराग पासवान की लोजपा से कैसा संबंध रहेगा, किंतु अब चुनावी सफलता के लिए चिराग पर उसकी निर्भरता की कोई मजबूरी नहीं।

विकास एवं जन कल्याण के कामों का चुनाव पर पड़ा सकारात्मक असर 

राज्य में सामाजिक समीकरण के साथ-साथ विकास एवं जन कल्याण के कामों का चुनाव पर सकारात्मक असर फिर दिखा। अब राज्य भर में बिजली पहुंचा दी गई है। राज्य के अधिकतर इलाकों के लिए बिजली एक सपने की तरह थी। किसानों, महिलाओं और छात्र-छात्राओं के लिए जारी केंद्र और राज्य सरकार की अनेक योजनाएं काम कर गईं। नल जल योजना में अनियमितताओं की खबरें हैं, पर इस योजना में लूट मचाने वालों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई हुई है।

नई सरकार को पहले से अधिक सक्रियता दिखानी होगी

नई राज्य सरकार को अब दो मोर्चों पर पहले से अधिक सक्रियता दिखानी होगी। एक तो अपराध के मामले में लोगों को कुछ और ठोस काम चाहिए। इसके लिए पुलिस प्रशासन को चुस्त और भ्रष्टाचारमुक्त करना होगा। चूंकि बिहार नेपाल की सीमा पर स्थित है, इसलिए भी कानून-व्यवस्था में बेहतरी और जरूरी है। राष्ट्रद्रोही तत्वों की भारत-नेपाल की सीमा से अबाध आवाजाही को रोकने की चुनौती सामने है। इसके साथ ही सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार को लेकर लोगों में नाराजगी देखी जाती है। इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने होंगे।

यदि गरीबों तक शिक्षा एवं स्वास्थ्य का लाभ पहुंचाना है तो सरकार को और चुस्ती से काम करना होगा

हाल के वर्षों में शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्रों की कमजोरियां सामने आई हैं। इसके लिए कुछ हलकों में मौजूदा शासन को भी जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। यदि गरीबों तक शिक्षा एवं स्वास्थ्य का लाभ पहुंचाना है तो सरकार को और चुस्ती से काम करना होगा। उम्मीद है कि नई सरकार इस दिशा में पहले से बेहतर काम करेगी।

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