West Bengal Election – निरंतर लक्ष्य प्राप्ति के लिए आगे बढ़ना ही आज की भारतीय जनता पार्टी है!
पश्चिम बंगाल में भाजपा का उदय: डॉ. मुखर्जी के ‘बीज‘ से 2026 के ‘प्रचंड बहुमत‘ तक का सफर

“चरैवेति चरैवेति” – यानी निरंतर चलते रहना, बिना रुके, बिना थके। निडर होकर अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ना ही आज की भारतीय जनता पार्टी की कार्यशैली की पहचान बन चुका है। 4 मई 2026 के चुनावी नतीजों ने इतिहास के पन्नों को पलट दिया है।अब कोलकाता की सड़कों पर भाजपा कार्यकर्ता जीत का गुलाल उड़ा रहे हैं, और देश भर में झालमुड़ी खिलाई जा रही है, तो यह केवल एक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सात दशकों के वैचारिक संघर्ष की परिणति है।
इस सफर की शुरुआत 74 साल पहले हुई थी। पश्चिम बंगाल की माटी के लाल डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जनसंघ के रूप में राष्ट्रवाद के पहले वैचारिक बीज का रोपण किया था। 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में जनसंघ ने 9 सीटें जीतकर एक शानदार आगाज़ किया था। डॉ. मुखर्जी ने प्रखर विपक्षी नेता के रूप में बंगाल की अस्मिता, सीमावर्ती सुरक्षा और शरणार्थियों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 1953 में कश्मीर में उनकी असमय मृत्यु के बाद बंगाल में भाजपा (जनसंघ) जैसे रसातल में चली गई। इसके बाद दशकों तक वामदल, कांग्रेस और फिर टीएमसी का वर्चस्व रहा। 1952 से 2014 तक का वक्त ऐसा था, जब बंगाल में भाजपा का झंडा उठाने वाला कोई नामलेवा तक नहीं बचा था।
पिछले एक दशक में भाजपा ने 3 सीटों से 207 सीटों तक का सफर किसी चमत्कार की तरह तय किया है। लेकिन इस ‘चमत्कार‘ के पीछे उन जुझारू कार्यकर्ताओं का लहू है, जिन्होंने बंगाल में संगठन खड़ा करने के लिए अपनी जान तक की परवाह नहीं की। इस चुनावी यात्रा को मुख्य पड़ावों में समझा जा सकता है:
आधार निर्माण (2014-2019): 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने चुपचाप अपना वोट प्रतिशत बढ़ाना शुरू किया। 2019 में 18 लोकसभा सीटें जीतकर भाजपा ने पहली बार टीएमसी के अभेद्य दुर्ग में बड़ी सेंध लगाई।
बूथ-लेवल की नींव (2021): 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा भले ही सरकार नहीं बना पाई, लेकिन 3 सीटों से सीधे 77 सीटों पर पहुँचकर उसने मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल किया। इसी समय अमित शाह और केंद्रीय नेतृत्व ने ‘पन्ना प्रमुख‘ जैसी सूक्ष्म रणनीतियों पर काम शुरू किया।
2026 की जीत के पीछे कुछ ऐसी रणनीतियां रहीं, जिन्होंने सीधे जनता के दिल पर चोट की:
बूथ-शक्ति अभियान: 70,000 बूथों पर 7 लाख से ज्यादा कार्यकर्ताओं की एक फौज तैयार की गई।
महिला और युवा आउटरीच: ‘मातृ शक्ति भरोसा कार्ड‘ और ‘नरेंद्र कप‘ फुटबॉल टूर्नामेंट ने साइलेंट वोटर्स को पार्टी से जोड़ दिया।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: ‘वंदे मातरम‘ के 150 वर्ष और स्थानीय उत्सवों के जरिए भाजपा ने खुद को बंगाल की मिट्टी और संस्कृति में विलीन कर दिया, जिससे “बाहरी” होने का ठप्पा सदा के लिए मिट गया।
हिंसा के बीच उभरा जनाधार
हालाकि बंगाल की राजनीति में हिंसा एक दुखद सच रही है। संदेशखाली की हृदयविदारक घटना, आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज कांड और बीरभूम नरसंहार जैसी घटनाओं ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। भाजपा ने इन घटनाओं को “तुष्टिकरण की राजनीति” और “लोकतंत्र की हत्या” के प्रतीक के रूप में पेश किया। “सुरक्षा और न्याय” को चुनावी मुद्दा बनाकर भाजपा ने उन मतदाताओं का भरोसा जीता जो भय के साये में जी रहे थे।
रणनीतिकारों की भूमिका
इस महाविजय की पटकथा लिखने में कैलाश विजयवर्गीय जैसे दिग्गजों का योगदान अविस्मरणीय है। 2015 में जब वे प्रभारी बनकर आए, तब स्थिति चुनौतीपूर्ण थी। सुवेंदु अधिकारी के जमीनी संघर्ष, दिलीप घोष के संगठन विस्तार और अमित शाह की दूरदर्शिता ने मिलकर टीएमसी के किले को ढहा दिया। जीत के बाद विजयवर्गीय की भावुक आँखों ने उस एक दशक के संघर्ष की कहानी खुद बयां कर दी।
9 मई 2026 को जब बंगाल में भाजपा की पहली सरकार शपथ लेगी, तो वह उन बलिदानियों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने बंगाल की धरती को भाजपा के रंगों में रंगने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। यह जीत डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उस अधूरे सपने की पूर्णता है, जिसमें बंगाल को पुनः उसकी सांस्कृतिक और राजनीतिक गरिमा वापस मिलनी थी।
बंगाल अब बदल चुका है!
