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सिद्धू को लेकर कैप्टन के तेवर पड़े नरम

चंडीगढ़: लंबे समय से कांग्रेस में ही वनवास झेल रहे पूर्व कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू और मुख्यमंत्री कै. अमरेंद्र सिंह के रिश्तों में जमी बर्फ अचानक पिघलने से कांग्रेस राजनीतिक तौर पर पंजाब में मजबूत नजर आने लगी है। दोनों नेताओं के बीच क्या समझौता हुआ है, इस मुद्दे पर अब तक कुछ स्पष्ट नहीं हुआ है मगर माना जा रहा है कि हाईकमान ने ही दोनों नेताओं को पार्टी हित में परस्पर मतभेद फिलहाल भुलाने को कहा है।

प्रदेश कांग्रेस प्रभारी हरीश रावत ने जब से पंजाब आकर जिम्मेदारी संभाली है तभी से सिद्धू को लेकर करीब रोजाना ही बयान दागते आ रहे हैं। कभी उन्हें कांग्रेस का भविष्य बताया तो कभी कांग्रेस का राफेल। अब सिद्धू को राष्ट्रीय स्तर पर कोई जिम्मेदारी सौंपी जाएगी या कैप्टन सरकार में बतौर कैबिनेट मंत्री वापसी होगी, इस संबंध में अभी तस्वीर साफ नहीं है मगर रावत ने नई भूमिका को लेकर संकेत जरूर दिए हैं। उनके ये प्रयास भी अब रंग लाते नजर आए जब विधानसभा में सिद्धू ने कृषि बिलों पर बहस दौरान कैप्टन अमरेंद्र के हक में खुलकर भाषण दिया। हालांकि इससे करीब दो सप्ताह पहले ही राहुल गांधी और कैप्टन अमरेंद्र की मौजूदगी में ही सिद्धू ने कैबिनेट मंत्री सुखजिंद्र सिंह रंधावा को मंच से ही लताड़ लगा दी थी। प्रदेश प्रभारी हरीश रावत और प्रदेश प्रधान सुनील जाखड़ समेत कई सांसद व मंत्री भी प्रकरण के गवाह रहे थे। हालांकि रंधावा ने कुछ दिन सार्वजनिक तौर पर नाराजगी भी जताई मगर सिद्धू पर ठोस कार्रवाई करवाने में नाकाम रहे। कैप्टन अमरेंद्र ने भी इस पर कोई खास टिप्पणी नहीं की जबकि रंधावा उनके करीबी नेताओं में शुमार होते हैं। इससे यह संकेत तो पहले ही मिलने लगा था कि कैप्टन अमरेंद्र को हाईकमान ने रावत की मार्फत कुछ खास संदेश सिद्धू के संबंध में भिजवाया है और इसी वजह से उनके तेवर नरम पड़े हुए हैं।

सिद्धू पिछले साल जून में दिए इस्तीफे के बाद से राजनीतिक वनवास भुगत रहे हैं। वह किसी राजनीतिक मंच पर दिखाई नहीं देते थे और न ही पार्टी बैठकों में नजर आते थे। सिद्धू और कैप्टन के बीच उसी दिन से ऐसी खाई बन गई थी जब सिद्धू ने दिल्ली में राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस में शामिल होने का ऐलान किया था जबकि पूर्व में कई बड़े नेता कैप्टन अमरेंद्र के नेतृत्व में ही शामिल हुए थे। यह सीधा संदेश था कि वह कैप्टन अमरेंद्र के समानांतर अपनी भूमिका हाईकमान से चाहते हैं। इसके बाद राहुल गांधी को अपना कैप्टन बताने के साथ-साथ नशे व रेत-बजरी जैसे माफिया को लेकर भी बयान दिया था कि वह सी.एम. होते तो दोषी सलाखों के पीछे होते। ऐसे बयान से कैप्टन अमरेंद्र की साख पर पंजाब में सीधे असर पड़ रहा था। लोकसभा चुनाव नतीजों ने कैप्टन अमरेंद्र को सिद्धू के पर कतरने का मौका दिया। उन्होंने ऐसी चाल चली जिससे सिद्धू कैबिनेट से आऊट तो हुए ही, सूबे की राजनीति में भी हाशिए पर चले गए थे। अब कैप्टन अमरेंद्र के तेवर नरम पडऩे के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि मौजूदा समय में अकाली दल के एन.डी.ए. से अलग होने और किसान आंदोलन से राजनीतिक हवा के कांग्रेस के हक में बहने को समय रहते भांप कर पार्टी की ऐसी अंदरूनी खींचतान से खुद ही दूर रहने का फैसला किया है जो सत्ता की लगातार दूसरी पारी में कोई रुकावट बन सकती हो। कैप्टन अमरेंद्र के करीबी नेताओं का मानना है कि मौजूदा हालात से लगता है कि 2022 में एक बार फिर कांग्रेस 2017 वाला प्रदर्शन दोहराएगी। सिद्धू कांग्रेस के प्रोग्राम में खुलकर साथ चलते हैं तो इससे पार्टी को ही राजनीतिक फायदा होगा। अन्यथा 2014 में जिस तरह से भाजपा में रहते हुए खुद को चुनाव प्रचार से दूर रखा था, उससे अरुण जेतली जैसे दिग्गज को भी मोदी लहर के बावजूद हार का मुंह देखना पड़ा था।

हरीश रावत निभा रहे अहम भूमिका
सिद्धू की कांग्रेस में मुख्य धारा में वापसी में सबसे अहम भूमिका हरीश रावत निभा रहे हैं। हाईकमान के विशेष दूत के तौर पर पंजाब प्रभारी की जिम्मेदारी संभालने के बाद से रावत पंजाब में ही डेरा जमाए हुए हैं। रावत न केवल मनमोहन सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं, बल्कि 3 साल उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। लंबे समय के बाद पार्टी ने ऐसे कद्दावर नेता को पंजाब प्रभारी बनाया है। इससे पहले आशा कुमारी और उनसे पहले डा. शकील अहमद प्रभारी रहे मगर दोनों का ही कद ऐसा नहीं रहा जो कैप्टन अमरेंद्र पर किसी भी तरह का दबाव बना सके। अब रावत का रुतबा ऐसा है कि कैप्टन अमरेंद्र भी उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते। यही वजह है कि सिद्धू के नाम पर अक्सर असहज महसूस करने वाले कैप्टन अमरेंद्र ने न केवल विधानसभा के हालिया सत्र में उन्हें बोलने का अवसर दिया, बल्कि उनके साथ रिश्तों की नई शुरूआत करने का भी संकेत दिया है।

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