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दिल्ली सीमा पर डटे किसानों को हटाने पर आज फिर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से मांगा जवाब

नई दिल्ली। नए कृषि कानूनों पर सरकार और किसान संगठनों के बीच टकराव खत्म होने की राह अब सुप्रीम कोर्ट से होकर निकलती दिख रही है। किसान आंदोलन और इसके चलते बंद रास्ते खुलवाने से संबंधित याचिकाओं पर बुधवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने समाधान तलाशने के लिए कमेटी गठित करने का संकेत दिया है। कमेटी में सरकार और किसान संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। अदालत ने इस संबंध में केंद्र, हरियाणा व पंजाब सरकारों एवं किसान संगठनों को नोटिस जारी कर संबंधित पक्षों से एक दिन में जवाब देने को कहा है। आज फिर मामले में सुनवाई होगी।

प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने रिषभ शर्मा, रीपक कंसल और जीएस मणि की याचिकाओं पर सुनवाई की। इस मामले में कोर्ट ने आठ किसान संगठनों को भी पक्षकार बनाते हुए नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने जिन किसान संगठनों को पक्षकार बनाया है उनमें भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू- राकेश टिकैत), बीकेयू सिधुपुर (जगजीत एस. डालवाल), बीकेयू – राजेवाल (बलबीर सिंह राजेवाल), बीकेयू- लखोवाल (हरिंदर सिंह लखोवाल), जमहूरी किसान सभा (कुलवंत सिंह संधू), बीकेयू – डाकौंडा (बूटा सिंह बुर्जगिल ), बीकेयू – डौडा (मनजीत सिंह राई) और कुल हिंद किसान फेडरेशन (प्रेम सिंह भांगू) शामिल हैं। सभी को गुरुवार तक जवाब देना है। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिये हुई सुनवाई में मौजूद थे, इसलिए कोर्ट ने केंद्र को औपचारिक नोटिस नहीं जारी किया है।

मामले पर सुनवाई के दौरान रिषभ शर्मा के वकील ने किसानों द्वारा दिल्ली बार्डर बंद किए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि लोगों को आने-जाने में परेशानी हो रही है। कोर्ट शाहीन बाग मामले में दिए फैसले में कह चुका है कि सड़क और रास्ते बंद नहीं किए जा सकते। इस पर पीठ ने कहा कि कानून व्यवस्था के मुद्दे पर कोई नजीर नहीं हो सकती। वे पक्षकारों को सुने बगैर आदेश नहीं देंगे। वकील जीएस मणि ने स्वयं को तमिलनाडु का किसान बताते हुए कहा कि वह चाहते हैं कि मामले का आपसी सहमति से हल निकले। पीठ ने मेहता से कहा कि जो भी याचिकाएं कोर्ट के समक्ष हैं, उनमें लोगों के आने-जाने की आजादी के अलावा कोई कानूनी मुद्दा नहीं दिख रहा। कोर्ट ने कहा कि सड़क बंद करने वाला एक ही पक्षकार सामने है, वह है सरकार। पीठ ने मेहता से पूछा कि किसने किसानों को दिल्ली आने से रोका है। मेहता का जवाब था, पुलिस ने।

पोस्टर से बात करते हैं किसान : सरकार

पीठ ने कहा कि आपकी वार्ता फेल हो गई। आप कह रहे हैं कि सरकार बातचीत के लिए तैयार है। मेहता ने कहा, ‘हां तैयार हैं, लेकिन किसानों के साथ दिक्कत यह है कि वे कहते हैं कि कानून रद किए बिना हम बात नहीं करेगे। वे हां और न के पोस्टर लेकर आते हैं। मंत्री उनसे बात करना चाहते हैं लेकिन उनके नेता अपनी कुर्सियां पीछे घुमाकर पीठ कर लेते हैं और हां या न का पोस्टर दिखाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि लगता है कि अन्य लोगों ने किसानों का आंदोलन हाईजैक कर लिया है

नहीं सुलझा तो राष्ट्रीय हो जाएगा मुद्दा

सब दलीलों पर पीठ ने समाधान के लिए कमेटी बनाने का संकेत देते हुए कहा कि हम कमेटी गठित करेंगे, जिसमें सरकार और किसान संगठनों के सदस्य होंगे। पूरे देश के किसान संगठनों के प्रतिनिधि इसमें शामिल होंगे। पीठ ने कहा कि ऐसा नहीं किया गया तो जल्दी ही यह राष्ट्रीय मुद्दा बन जाएगा और तब शायद सरकार इसे नहीं संभाल पाएगी।

कई दौर की बातचीत रही है बेनतीजा

उल्लेखनीय है कि किसानों के साथ सरकार कई दौर की वार्ता कर चुकी है, लेकिन अभी तक कोई हल नहीं निकला है, क्योंकि किसान तीनों कानून वापस लेने की जिद पर अड़े हैं। सरकार की ओर से पहले कमेटी बनाने की बात कही गई थी। उस पर किसान संगठन राजी नहीं हुए तो सरकार की ओर से ऐसे प्रावधानों में संशोधन भी सुझाए गए, जिन्हें लेकर किसानों में आशंका हो सकती है। सरकार के संशोधन प्रस्ताव के बाद भी किसानों की तरफ से अब तक वार्ता के लिए हामी नहीं भरी गई है।

साल्वे को नहीं मिली सुनवाई में बोलने की अनुमति

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे को बोलने की अनुमति नहीं मिली। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि साल्वे ने सुनवाई में शामिल होने का अनुरोध किया है। इस पर पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर साल्वे का नाम नहीं है। मेहता की ओर से बार-बार अनुरोध किए जाने पर सीजेआइ एसए बोबडे ने कहा, ‘बार-बार बाधित न करें। ऐसा नहीं है कि हम साल्वे को नहीं सुनना चाहते, लेकिन अभी अगर ऐसा किया गया तो पक्ष रखने के लिए वकीलों की लंबी लाइन लग जाएगी।’ सुनवाई के अंत में सीजेआइ ने मेहता से कहा कि साल्वे गुरुवार को सुनवाई में हिस्सा ले सकते हैं।

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