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न्यायपालिका में आमबोलचाल की भाषा के इस्‍तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, दी गई यह दलील

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में एक जनहित याचिका दाखिल कर के मांग की गई है कि शीर्ष अदालत न्याय विभाग को यह निर्देश दे कि वह गाइड और पुस्तिकाएं सामान्य अंग्रेजी और स्थानीय भाषाओं में जारी करे ताकि आम लोग भी कानून की व्‍याख्‍या और शिकायत निवारण प्रक्रियाओं को आसानी से समझ सकें। अधिवक्ता सुभाष विजयरण की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि अधिकतर वकीलों की लिखावट विस्तृत, अस्पष्ट और नीरस होती है।

याचिका के मुताबिक, अधिकांश वकील सामान्य बात को समझाने के लिए भी रहस्यमय वाक्यांश का प्रयोग करते हैं। सटीक होने के चक्कर में निरर्थक बातें लिखते हैं। उनकी लेखनी कानूनी बारीकियों की जगह कानूनी शब्दजाल ज्‍यादा बन जाती है। अक्‍सर देखा जाता है कि अधिवक्‍ता दो शब्‍द की जगह आठ शब्‍दों का प्रयोग करते हैं। इन्‍हीं जटिलताओं के चलते देश का आम आदमी ना तो न्याय व्यवस्था को समझ पाता है और ना ही कानून को।

याचिका में कहा गया है कि सबकुछ इतना जटिल और भ्रामक है कि देश का सामान्य जन कानून को समझ ही नहीं पाता है। आम आदमी की पहुंच न्याय तक नहीं हो पाना उसके मौलिक अधिकारों का हनन है। यही नहीं याचिका में एलएलबी की पढ़ाई में कानूनी प्रक्रियाओं को सामान्य अंग्रेजी भाषा में लिखने की पढ़ाई कराने की भी मांग की गई है।

उल्‍लेखनीय है कि हाल ही में एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट में सेक्रेटरी जनरल को अर्जी देकर देश के बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद के फैसले को हिंदी में उपलब्ध कराने की गुजारिश की थी। अखिल भारत हिंदू महासभा की ओर से अधिवक्‍ता विष्णु शंकर जैन की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट हिंदी समेत प्रादेशिक भाषाओं में भी फैसले उपलब्ध कराता है। ऐसे में उक्‍त फैसले को भी हिंदी में उपलब्‍ध कराया जाना चाहिए।

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