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ग्वालियर में बना करीब 400 साल पुराना कार्तिकेय मंदिर 1 बार खुलते हैं इसके कपाट

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक साल में केवल कार्तिक पूर्णिमा को रात 12 बजे मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। बता दें इस साल की कार्तिक पूर्णिमा 30 नवंबर को थी, जिस दौरान मंदिर के कपाट खोले गए। कोरोना के कारण बताया जा रहा है कि 400 साल पुराने इस कार्तिकेय मंदिर में हर सला की तरह दर्शन नहीं किए गए, कहने का भाव है कि कोविड के चलते साल में एक बार खुलने वाले इस मंदिर में आने वाले काफी लोग दर्शन करने नहीं आ पहुंचे।

इस साल की बात करें इस बार सिर्फ एक बार कार्तिक पूर्णिमा के दिन खोले जाने वाले भगवान कार्तिकेय मंदिर को रविवार रात 12 बजे खोला गया। जहां प्रत्येक वर्ष प्रातः 4 बजे से ही भक्तों की कतारें लग जाती थीं, लेकिन इस बार कोरोना से बचाव के मद्देनज़र भक्तों को 6 बजे से मंदिर में प्रवेश दिया गया।

मंदिर से जुड़ी मान्यताओं की बात करें तो कहा जाता है कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ था। भगवान शिव के वरदान से इस दिन जो भी उनके दर्शन कर लेता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रथम पूज्य बनने की प्रतियोगिता में जब माता-पिता की सात परिक्रमा कर गणेश विजयी हुए तो तीनो लोकों की प्रदक्षिणा कर लौटे देव सेनापति कार्तिकेय को निराशा हुई और क्रोध में आकर उन्होंने खुद को एक गुफा में बंद कर लिया। क्रोधित कार्तिकेय ने श्राप दिया कि जो महिला उनके दर्शन करेगी विधवा हो जाएगी औऱ पुरुष 7 जन्म तक नर्क भोगेंगे।

भगवान शिव के कहने पर कार्तकेय का क्रोध शांत हुआ। अंततः शिव ने वरदान दिया कि कार्तिक के जन्मदिन पर जो  उनके दर्शन करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी। इसीलिए यह मंदिर साल में मात्र एक दिन के लिए खुलता है। बता दें कि भगवान कार्तिकेय का यह मंदिर 450 साल पुराना है। पुजारी परिवार के मुताबिक, साधू संतों के द्वारा प्रतिमा की स्थापना की गई थी। यहां कार्तिकेय भगवान की छह मुख वाली पत्थर की प्रतिमा है, इसमें वह अपनी प्रिय सवारी मोर पर सवार हैं।

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